छप्पनिया अकाल: जब लोगों को कुत्तों से खाना छीनकर पेट भरना पड़ा
गाँव शहर की नई बातें — विशेष रिपोर्ट: नोट: इस रिपोर्ट में दिए कुछ विवरण आपको परेशान कर सकते हैं.
"कालू की ओर बहने वाली हवा और उस मौसम की मार मानो चिल्ला रही थी- खाओ! खाओ!"
मुख्य विवरण एवं घटनाक्रम
"पक्षी भी भूख और प्यास से तड़प रहे थे. चैत्र की हवाएँ और लू बिल्कुल सूखी और झुलसाने वाली थीं. चारों तरफ़ जली-पड़ी धरती ऐसी लगती थी, जैसे कालु को अपना दुश्मन मानकर उसके पैरों को जकड़ लेना चाहती हो."
घास के गठ्ठों और गहनों के सहारे किसी तरह दो महीने निकालने के बाद उसने पूछा, "क्या पूरे बारह महीने से रूठी हुई बारिश जेठ के आख़िरी पखवाड़े में भी नहीं लौटेगी?"
जमीनी पड़ताल व जनहित पर प्रभाव
"मानो जेठ का आख़िरी पखवाड़ा सामने खड़ा हो. कालु तुरंत बोल पड़ा, "एक बार बरसात आ जाए, फिर किसी तरह दिन कट ही जाएँगे. पेड़ों की कोंपलें और साग-पात खाकर भी गुज़ारा कर लेंगे. बस किसी तरह बारिश हो जाए."
"तभी गाँव की ढलान वाली पगडंडी के दूसरे छोर से एक चीख़ सुनाई दी, 'दौड़ो. मवेशियों पर हमला हो गया है. दौड़ो.'"
"कालू के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई. और ऊपर चढ़कर उसने जो नज़ारा देखा, उसे कालू सात जन्मों में भी नहीं भूल सकता था…"
"मरे हुए मवेशियों पर बीस कंकाल जैसे लोग टूट पड़े थे. उनके दांत चाकू की तरह दिख रहे थे. भूख ने उनके पेट में जैसे आग लगा रखी थी."
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