पीएचपी क्या है और इस साइबर अलर्ट से भारतीय यूज़र्स को कितना ख़तरा
गाँव शहर की नई बातें — विशेष रिपोर्ट: एक दशक से भी ज़्यादा समय तक इंटरनेट के बड़े हिस्से को चलाने वाली तकनीक में मौजूद गंभीर ख़ामियां पकड़ में नहीं आ सकी थीं.
इन ख़ामियों का पता लगाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद ली गई और इसके बाद दुनियाभर में साइबर सुरक्षा को लेकर अलर्ट जारी हो गया.
मुख्य विवरण एवं घटनाक्रम
बीबीसी संवाददाता ओसमंड चिया के मुताबिक ये ख़ामियां पीएचपी नाम की एक प्रोग्रामिंग लैंग्वेज में हैं, जिसका इस्तेमाल 2000 के दशक से दुनियाभर में वेबसाइट बनाने के लिए किया जाता रहा है. भारत में भी बड़ी संख्या में वेबसाइट और ऑनलाइन सेवाएं इस तकनीक पर निर्भर हैं, इसलिए इसका असर भारतीय यूज़र्स और संस्थानों तक भी पहुंच सकता है.
बुधवार को इन ख़ामियों का पता चलने के बाद दुनियाभर की सरकारें और साइबर सुरक्षा एजेंसियां इसके असर को रोकने की कोशिश में जुट गई हैं. उन्होंने वेबसाइट चलाने वालों से नया इमरजेंसी सुरक्षा अपडेट इंस्टॉल करने या ज़रूरत पड़ने पर अपने प्लेटफ़ॉर्म को ऑफ़लाइन करने की सलाह दी है.
जमीनी पड़ताल व जनहित पर प्रभाव
साइबर सुरक्षा कंपनी विज़ उन कंपनियों में शामिल है, जिनके शोधकर्ताओं ने इन ख़ामियों का पता लगाया. कंपनी ने इन्हें एआई की मदद से अब तक सामने आई "सबसे गंभीर" ख़ामियां बताया है.
इन ख़ामियों का पता लगाने में जिस तकनीक का इस्तेमाल हुआ, वह ओपनएआई की थी. ओपनएआई ने इस ख़ामी को 'बेहद गंभीर सिक्योरिटी इश्यू' माना है.
ज़्यादातर लोगों ने शायद पीएचपी का नाम नहीं सुना होगा, लेकिन वे संभवतः हर दिन इसका इस्तेमाल करते हैं.
पीएचपी का पूरा नाम हाइपरटैक्स्ट प्रीप्रोसेसर है. यह एक ओपन-सोर्स, बैक-एंड प्रोग्रामिंग लैंग्वेज है, जो वेब सर्वर पर चलती है.
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