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इसराइल के अंदर सैनिकों को ‘नाज़ी’ बताकर प्रदर्शन क्यों, क्या बंट रहा है इसराइली समाज?

इसराइल के अंदर सैनिकों को ‘नाज़ी’ बताकर प्रदर्शन क्यों, क्या बंट रहा है इसराइली समाज?

गाँव शहर की नई बातें — विशेष रिपोर्ट: सड़कों पर विरोध करते उग्र प्रदर्शनकारी इसराइली सुरक्षा बलों को "नाज़ी" बताते हुए उनकी निंदा कर रहे हैं. लेकिन यह लंदन या पेरिस की सड़कों पर फ़लस्तीनी लोगों के समर्थन में हो रही रैली नहीं है.

प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच यह झड़प इसराइल के बीचोंबीच हो रही है. यहां सफ़ेद कमीज़, काली फ़ेडोरा टोपी और लंबे काले कोट पहने सैकड़ों अति-रूढ़िवादी यानी अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदी सैन्य पुलिस के सामने खड़े हैं.

मुख्य विवरण एवं घटनाक्रम

विवाद की शुरुआत यरूशलम और तेल अवीव के बीच स्थित मोदिइन शहर की एक इमारत से हुई. यहां एक युवा अति-रूढ़िवादी यहूदी (हरेदी) रहता है. उसने इसराइल के नियमों के मुताबिक़ अनिवार्य सैन्य सेवा में हाज़िर होने से इनकार कर दिया. पुलिस इसी सिलसिले में उसे गिरफ़्तार करने पहुंची थी.

बीबीसी के वीडियो में दिखाए गए अक्तूबर की शुरुआत के इस घटनाक्रम जैसी कई घटनाएं पिछले कुछ महीनों में सामने आई हैं. इन घटनाओं ने इसराइली समाज में मौजूद एक गहरी दरार को और उजागर किया है.

जमीनी पड़ताल व जनहित पर प्रभाव

यह बढ़ती दरार ऐसे समय में सामने आ रही है, जब इसराइल कई मोर्चों पर लड़ रहा है. इनमें ग़ज़ा में हमास के ख़िलाफ़ जारी संघर्ष भी शामिल है. इसके अलावा, क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ चरमपंथी यहूदी बस्तियों के लोगों की हिंसा भी बढ़ रही है.

कभी एक छोटा अल्पसंख्यक समूह रहे अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदी आज भी एक अलग समुदाय के तौर पर रहते हैं, हालांकि उनकी संख्या हर साल बढ़ रही है. अभी अनुमान है कि वे इसराइल की कुल आबादी का क़रीब 14 फ़ीसदी हैं. इस समुदाय में जन्म दर भी दूसरे इसराइलियों के मुक़ाबले काफ़ी ज़्यादा है. अगर उनकी आबादी इसी रफ़्तार से बढ़ती रही, तो 2050 तक वे यहूदी इसराइली आबादी का एक-तिहाई हिस्सा हो सकते हैं.

अति-रूढ़िवादी समुदाय के बढ़ने के साथ ही उन्हें पूरे समय धार्मिक पढ़ाई करने के लिए दिए जाने वाले वज़ीफ़े के ख़र्च को लेकर बहस भी तेज़ हो गई है. इस समुदाय को दी जाने वाली सब्सिडी पर सरकार हर साल क़रीब 35 अरब शेकेल (84 लाख पाउंड) खर्च करती है. हाल तक इस समुदाय के लोगों को सैन्य सेवा से छूट भी मिली हुई थी.

अब इस अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदी समुदाय को एक छोटा और महत्वहीन अल्पसंख्यक समूह नहीं माना जा सकता. इसके साथ ही उन पर इसराइल के व्यापक समाज के साथ ज़्यादा जुड़ने का दबाव भी बढ़ रहा है.

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Accredited news correspondent and investigative contributor at गाँव शहर की नई बातें (Gaun Shahar Ki Nayi Batein).

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