ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति वाला क़ानून विवादों में, क्या हैं बड़े सवाल?
गाँव शहर की नई बातें — विशेष रिपोर्ट: इमेज स्रोत, Sanjeev Verma/Hindustan Times via Getty Images
मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न या एसआईआर की प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोपों के चलते मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर पिछले कई हफ़्तों से लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.
मुख्य विवरण एवं घटनाक्रम
शनिवार को विपक्ष के सांसदों ने उनके ख़िलाफ़ एक अनौपचारिक 'जन महाभियोग' का प्रस्ताव भी पारित किया.
साथ ही, साल 2023 में बनाया गया मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 भी विवादों के घेरे में है.
जमीनी पड़ताल व जनहित पर प्रभाव
दिसंबर 2023 में बने इसी क़ानून के तहत ज्ञानेश कुमार को मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त या इलेक्शन कमिश्नर नियुक्त किया गया था. उनके साथ मौजूदा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु को भी चुनाव आयुक्त बनाया गया था.
इस क़ानून में ऐसा क्या है, जिस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं? क़ानून के जानकार इसकी समीक्षा की ज़रूरत की बात क्यों कर रहे हैं?
अगर इस क़ानून को असंवैधानिक क़रार देते हुए रद्द कर दिया जाए, तो पिछले तीन सालों में लिए गए फ़ैसलों पर क्या कोई असर पड़ेगा? आइए समझते हैं.
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार मामले में अपने एक फ़ैसले में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक चयन समिति बनाने का निर्देश दिया था.
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