क्या हुआ उस लड़की का जो पढ़ना-लिखना भूल गई थी?
गाँव शहर की नई बातें — विशेष रिपोर्ट: राधिका कुमारी अपने पुराने प्राइमरी स्कूल के सामने खड़ी होकर दीवार पर लिखे सरकारी संदेश को पढ़ने की कोशिश करती हैं. लिखा है- गंदगी जानलेवा है, स्वच्छता ही सेवा है.
लेकिन 16 साल की राधिका बहुत मुश्किल से पहला शब्द ही पढ़ पाती हैं.
मुख्य विवरण एवं घटनाक्रम
बाक़ी पढ़ने की जगह वो आसपास पड़े कचरे की ओर इशारा कर देती हैं.
राधिका से हम पाँच साल पहले मिले थे, जब कोविड महामारी के दौरान हम शिक्षा के मानकों में पिछड़े और देश के सबसे ग़रीब राज्यों में से झारखंड के लातेहार ज़िले गए. वो वहाँ के एक छोटे से गाँव, डुंबी में रहती हैं.
जमीनी पड़ताल व जनहित पर प्रभाव
पाँच साल बाद जब हम फिर उनसे मिलने गए तो लगा वो ऊपर की क्लास में तो पहुँच गई हैं पर पढ़ाई पीछे छूट गई है.
राधिका के ज़रिए हम जानना चाहते थे कि कोविड महामारी में बंद हुए स्कूलों का, पिछड़े इलाक़ों में कम संसाधनों के बीच रह रहे बच्चियों की पढ़ाई पर कैसा असर पड़ा है.
साल 2024 में स्कूली शिक्षा पर देशव्यापी सर्वे में पाया गया कि औसतन बच्चों के सीखने का स्तर बेहतर हो गया है, लेकिन ये सभी बच्चों का अनुभव नहीं है.
महामारी में बंद रहे स्कूलों के बच्चों पर असर को समझने के लिए झारखंड के गांव-गांव घूमे अर्थशास्त्री ज़ॉं ड्रेज़ के मुताबिक, "आंकड़ों की औसत में बड़ी असमानताएं छिपी हैं".
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है
इस खबर पर सबसे पहले अपनी राय साझा करें और चर्चा शुरू करें!