घट गईं लोमड़ियाँ लेकिन छह गुना बढ़ गए मोर, तमिलनाडु में ये बदलाव कैसे और क्यों आया?
गाँव शहर की नई बातें — विशेष रिपोर्ट: लोमड़ी का नाम आते ही ज़हन में अक्सर चालाकी और धोखे की तस्वीर उभरती है.
फ़िल्मों में 'लोमड़ी की चाल' या 'वो लोमड़ी की तरह प्लानिंग कर रहा है' जैसे डायलॉग आपने भी सुने होंगे. फ़िल्में ही नहीं, रोज़मर्रा की बातचीत में भी लोमड़ी का ज़िक्र अक्सर इसी तरह होता है.
मुख्य विवरण एवं घटनाक्रम
लेकिन सोचिए, जिस लोमड़ी को हम अपनी बातचीत में बार-बार याद करते हैं, अगर वही धीरे-धीरे हमारे आस-पास से ग़ायब होने लगे तो क्या होगा?
वैसे तो लोमड़ियों की संख्या कम होने से भला क्या फ़र्क़ पड़ेगा. मगर प्रकृति में किसी एक जानवर का कम होना दूसरे जीवों की संख्या और पर्यावरण की पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है.
जमीनी पड़ताल व जनहित पर प्रभाव
पशु कल्याण के लिए काम करने वाले लोगों और कुछ अध्ययनों के मुताबिक़, पिछले कुछ सालों से भारतीय लोमड़ियों की संख्या लगातार घट रही है और मोरों की संख्या बढ़ी है. 'द स्टेट ऑफ़ इंडियाज़ बर्ड्स 2023' के आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु में मोरों की संख्या छह गुना बढ़ी है.
तो क्या भारतीय लोमड़ियों की संख्या में कमी और मोरों की बढ़ती संख्या आपस में जुड़े हैं?
भारतीय लोमड़ी पर हुए कुछ अध्ययनों के मुताबिक़, यह कुत्तों के परिवार का एक छोटा जानवर है, जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है. भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी यह बड़ी संख्या में पाया जाता है.
भारतीय लोमड़ियां आम तौर पर सूखे इलाक़ों, झाड़ियों वाले जंगलों, सूखे घास के मैदानों और कांटेदार पौधों वाले क्षेत्रों में रहती हैं.
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