ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो पाकिस्तान बनने के कई साल बाद भी ख़ुद को भारतीय साबित करने की कोशिश क्यों कर रहे थे?
गाँव शहर की नई बातें — विशेष रिपोर्ट: भारत की आज़ादी में अभी सात-आठ महीने बाक़ी थे. सिंध के एक बड़े ज़मींदार और राजनेता सर शाह नवाज़ भुट्टो अपनी पत्नी और बेटी के साथ जूनागढ़ रियासत में सरकार संभालने के लिए गए.
वे अपने छोटे बेटे ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को बंबई में पढ़ाई करने और ख़ानदान की बड़ी संपत्तियों की देखभाल करने के लिए छोड़ गए.
मुख्य विवरण एवं घटनाक्रम
सितंबर 1947 में, जब ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो बंबई (अब मुंबई) छोड़कर उच्च शिक्षा के लिए विदेश चले गए, तब भारत सरकार ने उनकी संपत्तियों को 'इवैक्यूई' यानी मालिक के पाकिस्तान चले जाने के कारण छोड़ी गई संपत्ति घोषित कर दिया और अपने कब्ज़े में ले लिया.
इस ज़ायदाद को दोबारा हासिल करने के लिए भुट्टो ने अगले नौ वर्षों तक ख़ुद को 'भारत का नागरिक' बताते हुए भारत की अदालतों में क़ानूनी लड़ाई लड़ी.
जमीनी पड़ताल व जनहित पर प्रभाव
स्टेनली वोलपार्ट ने ज़ुल्फ़िक़ार भुट्टो की आत्मकथा 'ज़ुल्फ़ी भुट्टो ऑफ़ पाकिस्तान: हिज़ लाइफ़ एंड टाइम्स' में लिखा है कि जब ज़ुल्फ़िक़ार भुट्टो के परिजन जूनागढ़ चले गए थे, तब वह बंबई के कारमाइकल रोड पर अपने घर 'द नेस्ट' में रहने लगे थे.
एडवोकेट संजय घोष ने वेबसाइट 'बार एंड बेंच' के लिए एक लेख में लिखा है कि बंबई के वर्ली एस्टेट में स्थित मकान नंबर 4ए को सर शाह नवाज़ भुट्टो ने बंबई के नगर निगम से स्थायी पट्टे पर लिया था.
वह 1946-47 में बंबई के व्यस्त फ़ोर्ट इलाक़े में एक अन्य पारिवारिक संपत्ति, बहुमंज़िला होटल एस्टोरिया से 110,000 रुपये से अधिक किराया हासिल करते थे. भुट्टो के पास कई वित्तीय गारंटी, क़ीमती सामान और नक़दी भी छोड़ी गई थी.
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