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फ़र्ज़ी जॉब ऑफ़र, ‘साइलेंट ले-ऑफ़’ और एआई की चुनौती

फ़र्ज़ी जॉब ऑफ़र, ‘साइलेंट ले-ऑफ़’ और एआई की चुनौती

गाँव शहर की नई बातें — विशेष रिपोर्ट: सेल्स के क्षेत्र में क़रीब छह साल काम करने के बाद, जब प्रियंका भावसार को एक आईटी कंपनी में नौकरी का ऑफ़र मिला, तो उन्हें लगा कि यह उनके करियर की एक नई शुरुआत होगी और उनका सपना सच होने जा रहा है.

लेकिन अब नौबत यह आ गई है कि उन्हें पुलिस स्टेशन के चक्कर काटने पड़ रहे हैं. इसकी वजह बना है आईटी कंपनी में नौकरी करने का यही सपना.

मुख्य विवरण एवं घटनाक्रम

सेल्स छोड़कर आईटी सेक्टर में आने की सोच रहीं प्रियंका भावसार को एक कंसल्टेंसी के ज़रिए नौकरी का यह ऑफ़र मिला था. शर्त यह थी कि नौकरी पाने के बदले उन्हें एजेंसी को एक तय रक़म (फ़ीस) देनी होगी और उसके बाद बताई गई आईटी कंपनी में काम शुरू करना होगा.

इसी के तहत 'क्रिएटिव वेब सॉल्यूशंस' नाम की कंपनी में उनकी नियुक्ति हुई. हालांकि यह आईटी कंपनी से जुड़ी नौकरी थी, लेकिन इसमें उनका सेल्स का अनुभव भी काम आने वाला था.

जमीनी पड़ताल व जनहित पर प्रभाव

पुणे के औंध इलाक़े में स्थित ऑफ़िस में बुलाकर उन्हें लैपटॉप दिया गया और काम के तौर पर अलग-अलग प्रेज़ेंटेशन बनाने को कहा गया. लेकिन डेढ़ महीने के भीतर ही उनका यह सपना टूटने लगा. महीना पूरा हो गया, लेकिन प्रियंका को सैलरी नहीं मिली.

बीबीसी से बात करते हुए प्रियंका भावसार ने बताया, "मैंने फ़रवरी के 15 दिन (आधा महीना) और मार्च का पूरा महीना काम किया था, लेकिन इन दोनों महीनों की सैलरी नहीं दी गई. जब मैंने मार्च के आख़िर में फ़ोन करके पूछा कि मुझे सैलरी क्यों नहीं मिली, तो मुझे बताया गया कि दोनों महीनों की सैलरी 12 से 15 तारीख़ के आसपास जमा होगी. मैंने उनसे कहा कि ऑफ़र लेटर में तो 10 तारीख़ लिखी है. इस पर उन्होंने कहा कि यह एक स्टार्ट-अप कंपनी है, इसलिए थोड़ी आर्थिक दिक़्क़तें हो सकती हैं और तारीख़ आगे-पीछे हो जाती है."

इसी बात से प्रियंका को शक हुआ कि कुछ गड़बड़ है. बाद में जब प्रियंका को सैलरी दी गई, तो उनके खाते में 24 हज़ार रुपये (जो तय किए गए थे) के बजाय सिर्फ़ 17 हज़ार 500 रुपये ही डाले गए.

दोबारा पूछताछ करने पर उन्हें बताया गया कि चूंकि उन्हें किसी भी प्रोजेक्ट पर नहीं लगाया गया था, इसलिए बाक़ी पैसे काट लिए गए हैं. प्रियंका ने बताया, "आधी-अधूरी रक़म जमा करने और कोई प्रोजेक्ट न होने का बहाना सुनने के बाद, मैंने ऑफ़िस से ही पुलिस को फ़ोन कर दिया."

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सत्यापित एवं प्रामाणिक समाचार रिपोर्ट (Fact-Checked & Verified)यह समाचार गाँव शहर की नई बातें संपादकीय डेस्क द्वारा अधिकृत आधिकारिक अभिलेखों, तथ्यों एवं प्रत्यक्ष स्रोतों की पूर्ण पुष्टि एवं समीक्षा उपरांत जनहित में प्रकाशित किया गया है। हमारी टीम निष्पक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है।

Accredited news correspondent and investigative contributor at गाँव शहर की नई बातें (Gaun Shahar Ki Nayi Batein).

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